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कोरोना वायरस वायरस का प्रकोप सबसे पहले 31 दिसंबर, 2019 को वुहान, चीन में हुआ था. अर्थव्यवस्था पर प्रभाव के बारे में विस्तार से पढ़ने से पहले, सबसे पहले कोरोना वायरस के बारे में जानते हैं.

कोरोना वायरस (CoV) वायरस का एक बड़ा परिवार है जो बीमारी का कारण बनता है. इससे आम सर्दी से लेकर Middle East Respiratory Syndrome (MERS-CoV) और Severe Acute Respiratory Syndrome (SARS-CoV) जैसी गंभीर बीमारियाँ हो सकती हैं. नॉवेल कोरोना वायरस वायरस का एक नया प्रकार है जो कि अभी तक मानव में नहीं पाया गया था.

चीन और दुनिया के अन्य देशों में COVID-19 के प्रकोप से वैश्विक स्तर पर आर्थिक मंदी, व्यापार, सप्लाई चैन  का व्यवधान, वस्तुओं और लोजिस्टिक्स सहित अर्थव्यवस्था पर महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ने की उम्मीद है.

आयात में, चीन पर भारत की निर्भरता बहुत बड़ी है. शीर्ष 20 उत्पादों में से (एचएस कोड के दो अंकों में) जो भारत दुनिया से आयात करता है, चीन उनमें से अधिकांश में एक महत्वपूर्ण हिस्सेदारी रखता है.

भारत का कुल इलेक्ट्रॉनिक आयात यानी लगभग 45% चीन पर निर्भर है. लगभग एक-तिहाई मशीनरी और लगभग two-fifth कार्बनिक रसायन जिन्हें भारत दुनिया से खरीदता है, चीन से आते हैं? मोटर वाहन भागों और उर्वरकों के लिए भारत के आयात में चीन की हिस्सेदारी 25% से अधिक है. लगभग 65 से 70% सक्रिय फार्मास्युटिकल सामग्री और लगभग 90% मोबाइल फोन चीन से भारत में आते हैं.

इसलिए, हम कह सकते हैं कि चीन में कोरोना वायरस के प्रकोप के कारण, चीन पर आयात निर्भरता का भारतीय उद्योग पर महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ सकता है. परन्तु अब चीन में हालात सुधर रहे हैं तो हो सकता है की आने वाले समय में कुछ बदलाव देखने को मिले.

भारत और चीन के अपवाद के साथ, विश्व अर्थव्यवस्था कोरोनोवायरस महामारी के कारण मंदी में चली जाएगी.  विश्व अर्थव्यवस्था इस वर्ष मंदी के दौर में जाएगी, जिससे अरबों-खरबों डॉलर की वैश्विक आय का नुकसान होगा.

  COVID-19 से विकासशील देशों को आर्थिक झटका लगा है, वह काफी ड्रामेटिक है. UNCTAD के महासचिव मुखिसा (Mukhisa) ने कहा, “सदमे से आर्थिक गिरावट जारी है और भविष्यवाणी करना मुश्किल है, लेकिन स्पष्ट संकेत हैं कि विकासशील अर्थव्यवस्थाओं के लिए चीजें बहुत खराब होंगी.”

भारतीय अर्थव्यवस्था की बुनियाद भले ही कृषि क्षेत्र हो. लेकिन, वर्तमान समय में भारतीय अर्थव्यवस्था में विकास के पीछे मिडिल क्लास और लोअर मिडल क्लास का सबसे बड़ा हाथ है. यही कारण है कि भारत को एक ‘मिडिल इनकम ग्रुप’ की अर्थव्यवस्था के रूप में परिभाषित किया जाता है.

कोविड-19 के जारी वैश्विक संकट के बीच भारतीय परिदृश्य में आर्थिक दृष्टिकोण हैं,  भारतीय अर्थव्यवस्था की सबसे कमजोर आबादी यानी किसान, असंगठित क्षेत्र में काम करने वाले मजदूर, दैनिक मजदूरी के लिए शहरों में पलायन करने वाले मजदूर और शहरों में सड़क के किनारे छोटा-मोटा व्यापार करके आजीविका चलाने वाले लोग.

भारतीय अर्थव्यवस्था में उत्पादन करने वाले यानी वह क्षेत्र जो इस देश में पूंजी और गैर-पूंजी वस्तुओं का उत्पादन करता है. सामान्य भाषा में कहें तो मैन्यूफैक्चरिंग सेक्टर या बिजनेस सेक्टर. सरकारों ने अपने देश में स्थिति से निपटने के लिए बड़े राहत पैकेज का एलान किया है और उसी क्रम में भारत सरकार ने भी गरीबों की मदद के लिए एक बड़े पैकेज का एलान किया है.

सरकार ने पहले चरण में जो राहत पैकेज जारी किया है वह पूरी तरीके से कमजोर और असंगठित क्षेत्र के लोगों की समस्याओं के निवारण के लिए है. कोरोना वायरस की वजह से आए आर्थिक संकट से जूझ रहे इस तबके के लिए सरकार ने 1.7 लाख करोड़ रुपये का पैकेज जारी किया है. वैश्विक स्तर पर अमेरिका ने सबसे बड़ा आर्थिक पैकेज अपनी अर्थव्यवस्था के लिए जारी किया है. अमेरिका ने करीब 30 करोड़ लोगों के लिए 2 ट्रिलियन डॉलर यानी कुल 151 लाख करोड़ रुपये का राहत पैकेज जारी किया है. यह भारत के कुल बजट के लगभग 5 गुना ज्यादा है.

केंद्र और राज्य सरकारों को मिडिल क्लास को चर्चा का केंद्र बिंदु बनाना इसलिए जरूरी है क्योंकि अर्थव्यवस्था में जारी हर संकट के बीच मिडिल क्लास सबसे अधिक कमजोर होता है. सरकारों द्वारा जारी होने वाले राहत पैकेज में यह क्लास शामिल नहीं हो पाता है.

आर्थिक संकट की घड़ी में अक्सर मिडिल क्लास कमजोर होता है और उसका एक हिस्सा अर्थव्यवस्था में गरीब आबादी की तरफ शिफ्ट हो जाता है. वर्तमान में कोविड-19 का संकट भी कुछ ऐसा संकेत दे रहा है.

अधिकतर छोटी सैलरी पर काम करने वाला मिडिल क्लास इस संकट में अधिक कमजोर हो और वह लोअर मिडिल क्लास या उससे भी नीचे की श्रेणी की तरफ शिफ्ट हो जाए. आईएमएफ ने भी अपनी रिपोर्ट में इसी तथ्य का जिक्र किया है कि भारत का मिडिल क्लास सिकुड़ रहा है. इसलिए यह जरूरी हो जाता है कि संकट के बीच भारतीय अर्थव्यवस्था में मौजूद मिडिल क्लास की भी आर्थिक परिस्थितियों को प्रमुखता से ध्यान दिया जाए.

अगर संकट गहराता है और लॉकडाउन को आगे बढ़ाया जाता है तब यह वृद्धि दर घटकर 1.5 फीसदी हो जाएगी. एडीबी (एशियन डेवलपमेंट बैंक) के अनुसार, भारत की आर्थिक वृद्धि दर 2020-21 में चार फीसदी संभावित है. मूडीज के अनुसार, भारत की जीडीपी दर का अनुमान वर्ष 2020-21 के लिए 2.5 फीसदी है.

भारत के परिप्रेक्ष्य से बात करें तो ‘सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकनॉमी (सीएमआईई) के जारी आंकड़ों के अनुसार, लॉकडाउन की वजह से कुल 12 करोड़ नौकरियां चली गई हैं. कोरोना संकट से पहले भारत में कुल रोजगार आबादी की संख्या 40.4 करोड़ थी. जो इस संकट के बाद घटकर 28.5 करोड़ हो चुकी है.

फिलहाल डब्‍लूएचओ की मानें तो कोविड-19 के संकट का अभी सबसे बुरा दौर आना बाकी है. यानी कि आज यह निष्कर्ष निकालना कठिन है कि अर्थव्यवस्था का सबसे बुरा दौर क्या होने वाला है? हम अभी सिर्फ संभावनाएं जता सकते हैं. लेकिन, यह जरूर स्पष्ट होता जा रहा है कि अर्थव्यवस्था में मांग एवं आपूर्ति आधारित सुस्ती के साथ-साथ बेरोजगारी का भीषण संकट आ रहा है.